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संगठन का विस्तार ही मनभेद और बिखराव

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संगठन का विस्तार ही मनभेद और बिखराव राहुल त्रिपाठी लोकतंत्र व सामाजिक तानेबाने में किसी संगठन, पार्टी, कुनबा, दल, संघ आदि की गहरी पकड़ होती है। लेकिन संगठन और दल का जैसे-जैसे विस्तार होता होता उसके पदाधिकारियों और सदस्यों की महत्वाकांक्षा बढ़ती जाती है। इसी कारण एक निश्चित उपलब्धी हासिल करने के बाद संगठन का ग्राफ नीचे आने लगता है। संगठन के पदाधिकारियों के आपसी सुर विरोधी होने लगते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में दलों की महती भूमिका होती है, 1950 के पहले और बाद में बड़ी संख्या में राजनैतिक ही नहीं बल्कि अराजनैतिक दल, पार्टी, संघों का जन्म हुआ उनका विस्तार भी दिनदूनी चार चैगुनी गति से हुआ, लेकिन जितनी तेजी से ऐसे संगठनों से लोग जुड़े उतने ही तेजी से उसका पतन भी जारी हो गया। इस मसले को ऐसे भी समझ सकते हैं जैसे चार लोगों ने हमारा दल नाम से पार्टी का गठन किया, उक्त चारों ने कड़ी मेहनत कर जिला, मंडल, प्रदेश में दल की सक्रियता बढ़ाने के लिए काम किया, किसी भी संगठन का पूर्णतः सफल बनाने में औसतन 10 से 20 वर्ष का समय लगता, समय गुजरने से संगठन की लोकप्रियता से दल में रोज नए लोग जुड़ते गए। ...

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