मार्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के गुरु महर्षि विश्वामित्र का वैदिक कालीन आश्रम बिल्हौर के विषधन में

विषधन स्थित महर्षि विश्वामित्र का वैदिककालीन आश्रम

विषधन स्थित महर्षि विश्वामित्र का वैदिककालीन आश्रम


 मंदिर में विराजे महर्षि विश्वामित्र व भगवान श्रीराम-लक्ष्मण

मंदिर निर्माण की खुदाई में निकले पुरातात्विक अवशेष

खुदाई में निकला भगवान भोलेनाथ का शिवलिंग


मंदिर में रखे वैदिक कालीन शिला
विषधन में हैं वैदिक कालीन महर्षि विश्वामित्र का आदिकालीन आश्रम
सुरक्षा, संरक्षा के अभाव और कब्जे से दिनोंदिन वैदिक धरोहर हो रही नष्ट
राहुल त्रिपाठी
बिल्हौर। मयार्दा पुरुषोत्तम श्रीराम से जुड़े कई धार्मिक स्थलों की तरह उनके गुरु महर्षि विश्वामित्र का विषधन स्थित आश्रम भी गुमनामी और संरक्षण के अभाव में दिनोंदिन अपनी पहचान खोता जा रहा है। वैदिक काल में कान्यकुब्ज (कन्नौज) में जन्मे महर्षि विश्वामित्र का अति प्राचीन आश्रम क्षेत्र के विषधन में है, लेकिन श्रीराम से जुड़ी अन्य प्राचीन स्मारकों की तरह यह स्थान भी संरक्षा के अभाव में अस्तिव खो रहा है। स्थानीय लोगों को आज भी विश्वामित्र आश्रम टीला पर खुदाई में महत्वपूर्ण पुरातत्व अवशेषों मिलते हंै, लेकिन इसके बाद भी भारतीय पुरातत्व विभाग व जिला प्रशासन द्वारा इसके संरक्षण की कोई पहल शुरू नहीं की जा सकी है।
भगवान श्रीराम, लक्ष्मण को राजनीति के पैतरे सिखाने वाले, प्राचीन इतिहास की जानकारी देने वाले और युद्ध विद्या के गुर बताने वाले महर्षि विश्वामित्र का क्षेत्र के विषधन स्थित आश्रम सुरक्षा, संरक्षा के अभाव में इन दिनों अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। क्षेत्र पंचायत सदस्य राजू दुबे ने बताया कि महर्षि विश्वामित्र का जन्म कान्यकुब्ज(कन्नौज) में हुआ था, महर्षि के आश्रम के समीप ही जनकपुरी (जनखत कन्नौज) और अहिल्या नगरी (महल्ला) है जो आज भी जंगलों वन क्षेत्र से घिरी हुई है। गांव के ही मोर सिंह, सिद्धशंकर, बाल किशन, द्विवेदी, सोबरन ने बताया कि उनके पूर्वजों ने महर्षि विश्वामित्र आश्रम में कई सुरंगे देखी थीं और उनमें आदिकालीन मूर्तियों की पूजा अर्चना की, लेकिन संरक्षण के अभाव में साल दर साल महर्षि का आश्रम जीर्ण-क्षीर्ण होता चला गया है। शशिकांत दुबे के मुताबिक महर्षि आश्रम से कुछ दूरी पर ही हिंदुओं की पवित्र नदी पांडू है और करीब पांच किमी दूर गंगा नदी है। मान्यता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, लक्ष्मण भी महर्षि विश्वमित्र के इस आश्रम में रुके और उनकी तपस्या और यज्ञ में खलल डालने वाले असुरों का नाश किया। रामचरित्र मानस में महर्षि विश्वामित्र, महर्षि वशिष्ठ सहित महर्षि जमदग्रि और इनके पुत्र परशुराम के कान्यकुब्ज से जुड़े कई किस्से हैं जो विषधन के इस वैदिक कालीन आश्रम की पौराणिकता को प्रमाणित करते हैं।
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विश्वामित्र आश्रम से विषधन
बिल्हौर। कन्नौज जनपदीय सीमा पर स्थित आदिकालीन टीला पुराने समय से ही महर्षि आश्रम के नाम से जाना जाता रहा है, इसी को स्थानीय भाषा में अपभ्रंश होते-होते वर्तमान में विषधन हो गया है। महर्षि विश्वामित्र आश्रम में आज भी खुदाई में आदिकालीन मूर्तियां, पत्थर, पूजा-सामग्री, टेरीकोटा आदि ग्रामीणों को मिलते रहते हैं, लेकिन इसके बाद भी भारतीय पुरातत्व विभाग की नजर इस वैदिक कालीन टीले पर नहीं पड़ी है।
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राजस्व विभाग की अनदेखी में विश्वामित्र आश्रम पर कब्जे
बिल्हौर। बीते एक दशक में महर्षि विश्वामित्र आश्रम में सैकड़ों की संख्या में कच्चे-पक्के निर्माण कर एक विशेष धर्म के लोग कब्जाकर अपना अतिक्रमण कर चुके हैं, लेकिन इसके बाद भी राजस्व अधिकारी और स्थानीय पुलिस ऐसे कब्जेदारों पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही। कब्जा से जहां दो पक्षों में विवाद का अंदेशा कायम है वहीं आदिकालीन धरोहर भी नष्ट हो रही है। जबकि राजस्व अभिलेखों में आज भी महर्षि विश्वामित्र आश्रम के लिए करीब ५० बीघा से अधिक भूमि अंकित है।
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खुदाई में निकलीं देवी मूर्तियां व शिवलिंगबिल्हौर। विषधन स्थित महर्षि विश्वामित्र आश्रम में इन दिनों सबसे ऊंचे शिखर पर ग्रामीणों द्वारा चंदाकर भगवान बजरंग बली के मंदिर का निर्माण कराजा रहा है। मंदिर के पुजारी शिवदीन और रामसेवक ने बताया कि निर्माण के दौरान टीले पर खुदाई करने पर कई खंडित मूर्तियों के साथ भगवान भोले नाथ का शिवलिंग, सूक्ष्म देवी प्रतिमा, लक्ष्मीजी की सवारी गेंडा की प्रतिमा और कई खंडित मूर्तियां निकली है जिनको मंदिर के समीप ही स्थापित कर दिया गया है।
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रामतीर्थ के रूप में विकसित हो सकता विश्वामित्र आश्रमबिल्हौर। केंद्र और प्रदेश की सरकार मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से जुड़े स्थलों के विकास के लिए कई प्रकार की योजनाएं चलाए हुए हैं। यदि सरकार द्वारा विषधन स्थित महर्षि विश्वामित्र आश्रम का जीर्णोद्धार करा दे तो कानपुर नगर जनपद भी रामतीर्थ से जुड़ सकता है वहीं भारतीय पुरातत्व विभाग टीले को संरक्षण में लेकर कई प्रकार की वैदिक कालीन जानकारियां प्राप्त कर सकता है।
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महर्षि विश्वामित्र
भारतीय वैदिक काल के महर्षियों में एक विश्वामित्र का  जन्म कान्यकुब्ज ब्राम्हण परिवार में हुआ था। विश्वामित्र अमावसू वंश के राजा कुशनाभ के पौत्र एवं राजा काथि के पुत्र थे। इनके जन्म का नाम विश्वरथ था। धर्मांतरण से पूर्व विश्वामित्र तेजस्वी राजा कौशिक थे। क्षत्रियत्व से ब्राम्हत्व प्राप्त करने पर उन्हें विश्वामित्र कहा गया। विश्वामित्र महर्षि वशिष्ठ और महर्षि भारद्वाज के समकाली थे।
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वशिष्ठ और विश्वामित्र विवाद की वजह
महर्षि और विश्वामित्र के मध्य नंदनी नाम गाय का लेकर विवाद हुआ। नंदिनी गाय कामधेनू की पुत्री थी। नंदिनी गाय द्वारा वशिष्ठ जी के आश्रम सहित विश्वामित्र की संपूर्ण सेना के लिए दूध देने पर विश्वामित्र उक्त गाय को लेने के लिए अड़ गए। जिसको लेकर दोनों महार्षियों में विवाद हुआ। पहले सेना के बल पर विश्वामित्र ने नंदिनी गाय को हासिल कर लिया, जो वशिष्ठ जी का अच्छा नहीं लगा, इस पर वशिष्ठ जी ने योग बल के आधार विश्वामित्र की संपूर्ण सेना नष्ट कर दी। जिसके बाद विश्वामित्र को वशिष्ठ के सामने घुटने टेकने पड़े।
वहीं परशुराम के पिता जमदग्रि के पास भी कामधेनु गाय थी, जो आश्रम की सभी पौष्टिक आहार की जरूरतों को पूरा करती थी। तब विश्वामित्र ने जमदग्रि से यह कामधेनु गाय छीन ली।
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विश्वामित्र को ब्रम्हर्षि का सम्मान और सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ, उनमें क्रोध, अंहकार इत्यादि का विकार कम नहीं हुआ। इसलिए तत्कालीन ब्रम्हवर्ग उन्हें ऋषि नहीं मानता था। ऋषि बनने के लिए उन्होंने तपस्या को पराकाष्ठा तक ले जाने का निर्णय लिया। तपस्या भंग करने के लिए देवेंद्र ने रंभा अप्सरा को भेजा, पर रंभा विश्वामित्र की तपस्या भंग नहीं कर सकी।
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विश्वामित्र ने मार्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम,लक्ष्मण को राजनीति के अनेक पाठ सिखाए, प्राचीन इतिहास की जानकारी दी, युद्ध विद्या के रहस्य दिखाए-समझाए। विश्वामित्र के यज्ञों की सुरक्षा का काम श्रीराम और लक्ष्मण भली भांति करते थे।
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सीता स्वयंवर में परशुराम और महर्षि का विश्वामित्र का भी विवाद हुआ।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम महर्षि वशिष्ठ और महर्षि विश्वामित्र दोनों को अपना गुरु मानते थे।
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कान्यकुब्ज में गुरु महर्षि विश्वामित्र के गुरुकुल में रहे थे श्रीराम-लक्ष्मण
पांडू नदी किनारे विषधन में श्रीराम ने महर्षि विश्वामित्र से हासिल की  शिक्षा 
 कान्यकुब्ज का भगवान श्रीराम व अवधपुरी अयोध्या से रहा गहरा नाता 
श्रीराम मंदिर बनने से राम से जुड़े स्थलों के संरक्षण की आस बढ़ी
राहुल त्रिपाठी
बिल्हौर। करीब 5 सौ वर्षों के संघर्ष बाद जब अवधपुरी अयोध्या में मार्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जन्मस्थली पर भव्य मंदिर बनने का काम आरंभ हुआ है तो भगवान राम से जुड़े स्थलों के संरक्षण, सौदर्यीकरण और जीर्णोद्धार की आस बढ़ गई है। बिल्हौर के विषधन (विश्वामित्र का आश्रम) में आदिकालीन भगवान श्रीराम-लक्ष्मण का शस्त्राभ्यास गोकुल है। मान्यता है कि यहीं कान्यकुब्ज (कन्नौज) के गुरु महर्षि विश्वामित्र से श्रीराम व लक्ष्मण ने शिक्षा हासिल की और कई असुरों का नाश किया। लेकिन सदियों से रामनाम से जुड़ा यह स्थल गुमनामी और अस्तिव के संकट से जूझ रहा है। इस स्थल पर हजारों पुरातत्व अवशेषों को कब्जेदार दिनोंदिन नष्ट कर रहे हैं।
धार्मिक पांडू नदी किनारे बसे विषधन कस्बा जो आदिकाल में विश्वामित्र के आश्रम से जाना जाता था यहां आज भी वह स्थल है जहां मार्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और लक्ष्मण ने शस्त्र शिक्षा महर्षि विश्वामित्र से हासिल की थी और युद्ध के कौशल सीखे थे। इसी गुरुकुल में वैदिक अनुष्ठान पद्धति का ज्ञान भी श्रीराम ने हासिल किया। विश्वामित्र आश्रम के पुजारी कल्याणदास जी महाराज व अशोक ने बताया वैदिक कालीन इस स्थल पर महर्षि विश्वामित्र के संग भगवान श्रीराम व लक्ष्मण की प्रतिमा तो ज्यादा पुरानी नहीं है, लेकिन मान्यता है जहां यह प्रतिमा स्थापित है वहीं पर अवध नरेश ने धनु विद्या व अन्य शिक्षा पद्धतियां हासिल कीं। यज्ञ और वैदिक मंत्रों का ज्ञान हासिल किया। श्रीराम चरित मानस के अनुसार महर्षि विश्वामित्र, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि जमदग्रि और महर्षि परशुराम का भी इस आश्रम और भगवान राम से सीधा सरोकार रहा है। परिसर में ही सैकड़ों की संख्या में भगवान भोले नाथ के  शिवलिंग हैं और मामूली खुदाई पर ही यदाकदा मिलते भी रहते हैं। इसके अलावा कईप्रकार की आदिकालीन शिलालेख इस स्थल की पौराणिकता को स्पष्ट बयां करते हैं। यह भी मान्यता है कि महर्षि विश्वामित्र के इस आश्रम में अहिल्या सहित अन्य प्रकार के असुरों ने जब यज्ञ ने खलल डाला तो भगवान श्रीराम ने उनका अंत किया। वेदों में अवधपुरी अयोध्या में कान्यकुब्ज ब्राम्हणों से ही विविध धार्मिक अनुष्ठान का जिक्र भी मिलता है, जो विश्वामित्र के आश्रम से जुड़े है।

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मुस्लिमों के सहयोग से आश्रम में मंदिर
बिल्हौर। विषधन ग्राम प्रधान खुर्शीदा बानो के पति शरीफुद्दीन ने बताया कि विश्वामित्र आश्रम खेड़ा बहुत पुराना है वह बचपन से इसकी कई कथाएं सुनते आ रहे हैं होली पर्व पर सभी धर्मों और गांव के लोग यहां जुटते हैं और पूजा अर्चना भी करते हैं। कुछ वर्ष पहले ग्राम पंचायत के कई मुस्लिमों ने हिंदू भाइयों के साथ खेड़ा आश्रम पर चंदा जमा कर कई प्रकार के काम भी कराए थे। इसमें कोई शक नहीं यह स्थल भगवान श्रीराम से जुड़ा है यदि सरकार या भक्त इसको विकसित करना चाहते हैं तो उनकी पूरी ग्राम पंचायत इसमें पूरा सहयोग करेगी। इसके विकास से विषधन का विकास होगा।

 

 
 


















 

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